Saturday, 13 July 2019

ज़िंदगी का सफ़र


ज़िंदगी का समंदर 

समंदर ये जिन्दगी का बड़ा विशाल है,
इसमें उतारनी अपनी नाव
यह भी कहाँ आसान हैं?
हर तरफ घना अँधेरा छाया हुआ,
साहिल-ए- मंजिल का ना अता पता है|
दूर तलक नजरें फेरे,
फिर भी किनारा मिलना
एक मुश्किल सवालात है|
मंजिल तलाशते रास्ता भटक जाते
कभी इस ओर तो कभी उस ओर चले जाते,
ढूँढते-ढूँढते अपने मंजिल को
थके हारे मुसाफिर फिर चल पड़ते |
इस समुद्र की लहरें कभी उमड़ पड़ती
कभी पत्थरो से टकरा ये जाती|
गहराई इसकी जो नापी ना जा सके
जिसमे सम्भल के हैं बहुत चलना|
कुछ जो डरकर रुक जाते हैं इसी किनारे पे,
कुछ ऐसे भी जो अपनी ज़िद से कूद इसमें जाते|
जो बैठा है इस किनारे पर,
वही गवाह है उन मुसाफिरों का|
कौन तैर के मंजिल को पायेगा
किसकी हस्ती यह समन्दर मिटाएगा?
                                                                                  
                                                                                           -प्रिया


No comments:

Post a Comment

ज़िंदगी का सफ़र

ज़िंदगी का समंदर  समंदर ये जिन्दगी का बड़ा विशाल है, इसमें उतारनी अपनी नाव यह भी कहाँ आसान हैं? हर तरफ घना अँधेरा छाया हुआ, साह...