ज़िंदगी का समंदर
समंदर ये जिन्दगी
का बड़ा विशाल है,
इसमें उतारनी अपनी
नाव
यह भी कहाँ आसान
हैं?
हर तरफ घना
अँधेरा छाया हुआ,
साहिल-ए- मंजिल का
ना अता पता है|
दूर तलक नजरें
फेरे,
फिर भी किनारा
मिलना
एक मुश्किल
सवालात है|
मंजिल तलाशते रास्ता
भटक जाते
कभी इस ओर तो
कभी उस ओर चले जाते,
ढूँढते-ढूँढते
अपने मंजिल को
थके हारे मुसाफिर
फिर चल पड़ते |
इस समुद्र की लहरें
कभी उमड़ पड़ती
कभी पत्थरो से
टकरा ये जाती|
गहराई इसकी जो नापी
ना जा सके
जिसमे सम्भल के
हैं बहुत चलना|
कुछ जो डरकर रुक
जाते हैं इसी किनारे पे,
कुछ ऐसे भी जो अपनी
ज़िद से कूद इसमें जाते|
जो बैठा है इस
किनारे पर,
वही गवाह है उन
मुसाफिरों का|
कौन तैर के मंजिल
को पायेगा
किसकी हस्ती यह
समन्दर मिटाएगा?

